Friday, February 15, 2008

मेरा विचलित मन














मनुष्य का जीवन वास्तव मे एक चक्र है ! बचपन मे स्कूल की चिंता थी !
तब सोचा करता था की कॉलेज मे पहुँचने के बाद सारी चिताएँ ख़त्म हो जायेगी मस्ती से समय कटेगा लेकिन तब बोर्ड एक्साम्स का भारी दवाब सिर पर आ पड़ा ! कॉलेज के बाद एन आई दी की डिजाईन शिक्षा!
एक अंतहीन सिलसिला जो शुरू हुआ वो अब तक जारी है ! अब जॉब के जाल मे फँस गया हूँ ! मन को चैन नहीं ! क्या आदमी कभी अपनी स्थिति से संतुष्ट होता है ? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेरी जिंदगी का रियल उद्देश्य क्या है ? मेरी आत्मा क्यो छटपटा रही है ? कहीं चैन क्यो नहीं मिलता ?

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